Syphilis Ki Dawa

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Syphilis Ki Dawa

सिफलिस की दवा

उपदंश, सिफलिस(Syphilis)

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उपदंश को अंग्रेजी में सिफलिस(Syphilis) कहा जाता है। इस रोग की उत्पत्ति जन्मजात तथा उपार्जित दो प्रकार से होती है। किसी सिफलिस संक्रमित स्त्री या पुरूष के साथ मैथुन करने से जब सिफलिस रोग मिलता है, तब उसको उपार्जित रोग कहा जाता है। जब कोई सिफलिस ग्रस्त स्त्री गर्भवती हो जाती है, तब पेट में पल रहे भ्रूण के रक्त में सिफलिस के जीवाणु पहुंच जाते हैं। यदि इस प्रकार का बालक जन्म ले लेता है, तब वह जन्म से ही सिफलिस रोग से पीड़ित रहता है। सिफलिस ग्रस्त स्त्री या पुरूष के साथ मैथुन करने पर 1-2 सप्ताह के उपरान्त ही लक्षण प्रकट हो जाते हैं। सिफलिस का घाव या पुरूषों के शिश्न की सुपारी पर कहीं भी अथवा शिश्न की गर्दन पर, स्त्रियों के गर्भाशय-ग्रीवा, भगोष्ठ तथा समलिंगियों की गुदा, मलाशय, मुंह तथा बाहरी जननेन्द्रिय पर पाया जाता है।

शुरू-शुरू में तो इस बीमारी में कोई तकलीफ या जलन नहीं होती, लेकिन धीरे-धीरे जब यह बढ़ने लगती है, तो स्त्री-पुरूष के गुप्त अंगों पर घाव बनने शुरू हो जाते हैं और जब इसका जोर कुछ अधिक बढ़ता है, तो यह सारे शरीर पर फूट निकलती है। शरीर में लाल-लाल चकत्ते, दाने, फुन्सियां बनकर उनमें घाव हो जाते हैं। इस बीमारी में नाक की हड्डी तक गल जाती है तथा इन्द्री में सड़न व बदबू पैदा हो जाती है। जिंदगी जीते जी नरक बन जाती है, क्योंकि इस रोग में मिरगी, लकवा, फालिज, कोढ़ तथा पागलपन तक की शिकायत होने की संभावना बनी रहती है। इस बीमारी की सबसे खास बात यह है कि वर्षों तक इसका पता नहीं चलता, लेकिन धीरे-धीरे अंदर ही अंदर यह रोग बढ़कर रोगी की हालत खराब कर देती है तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसकी संतान में भी अपना असर छोड़ती रहती है। ऐसी बीमारी का जरा-सा भी आभास होने पर रोगी को चाहिए कि वह जल्दी ही अपनी जांच करा ले तथा सही-सटीक चिकित्सा करा कर ऐसी दुखदायी बीमारी से मुक्ति पा ले।

इस रोग की आयुर्वेदिक योग चिकित्सा नीचे सविस्तार प्रस्तुत की जा रही है। इनमें से कोई एक या दो योग अपनी सुविधा, रोग के लक्षण, तीव्रता के अनुसार अपने विवेक से चुनकर उपयोग में लायें।

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उपदंशनाशक आयुर्वेदिक योग-

Syphilis Ki Dawa

1. योग- मदार की जड़ की छाल 20 ग्राम, गुड़ आवश्यकतानुसार, काली मिर्च 10 ग्राम।
विधि- उपर्युक्त दोनों औषधियों को कूट-पीसकर एक जान महीन चूर्ण कर लें तथा उसके बाद उसको छान लें। छने चूर्ण को गुड़ मिलाकर ज्वार के बराबर की गोलियों का निर्माण कर लें। सिफलिस गर्मी या उपदंश की चिकित्सा के लिए ये रामबाण अचूक गोलियां हैं, जो सिफलिस को निश्चित रूप से नष्ट कर, रोगी को स्वस्थ कर देती है।
सेवन विधि- 1-1 गोली दिन में 2 बार अथवा आवश्यकतानुसार सेवन करने का निर्देश दें। खटाई-मिठाई तथा बादी पदार्थों से रोगी को दूर रखें।

2. योग- सोना माखी भस्म, सफेद कत्था, छोटी इलायची के बीज, लौंग, रस कर्पूर, समुद्र झाग, नकछिकनी तथा तबाशीर प्रत्येक 10 ग्राम।
विधि- उपर्युक्त समस्त औषधियों को घोंट-पीसकर एक जान कर लें। जब अच्छी तरह पिस जाये, तब सबको पान के रस के साथ खूब घोंट-पीसकर एक जान कर लें। जब अच्छी तरह पिस जाये, तब सबको पान के रस के साथ खूब घोंटे-खरल करें। खरल हो जाने के उपरान्त चने के आकार की गोलियों का निर्माण कर लें। यह योग आतशक-उपदंश, फिरंग की चिकित्सा के लिए अतिशय गुणकारी सिद्ध है। उपदंश की समस्त अवस्थाओं की चिकित्सा इन योग से हो जाती है और पीड़ित रोगी स्वस्थ हो जाता है। ये गोलियां सिफलिस को समूल नष्ट कर देती हैं। इसका प्रभाव सर्वोत्तम शक्तिप्रद होता है। इसका प्रभाव शीघ्र होता है।
सेवन विधि- 1-1 गोली दिन में 2 बार अथवा आवश्यकतानुसार पीड़ित रोगी को सेवन करने के लिए दें।

Syphilis Ki Dawa

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3. योग- शुद्ध जमालगोटे की गिरी 3 ग्राम, चोक 4 ग्राम, काला तिल 3 ग्राम, खुरासानी अजवाइन 6 ग्राम, काली मिर्च 250 मि.ग्रा.।
विधि- उपर्युक्त पांचों औषधियों को एकत्र करें और कूट-पीसकर एक जान महीन चूर्ण कर लें। उसके बाद उसमें 125 ग्राम पुराना गुड़ मिलाकर 3-4 दिन तक खूब घोंटे-पीसें, खरल करें। जब ज्ञात हो कि भली-भांति घुटाई हो चुकी है, तब झड़बेरी के आकार की गोलियां बना लें। गोलियों को किसी सुरक्षित स्थान पर पेंचदार ढक्कन वाले कांच की शीशी में बंद करके रख लें। ये गोलियां उपदंश की चिकित्सा के लिए रामबाण अचूक होती है। ये उपदंश-फिरंग को समूल नष्ट कर रोगी को निरोग कर देती है। इसका प्रभाव शीघ्र होता है।
सेवन विधि- 1-1 गोली दिन में 1-2 बार अथवा आवश्यकतानुसार मलाई में लपेट कर सेवन करने का रोगी को निर्देश दें। तेल, घी, खटाई, मिठाई, लाल मिर्च से रोगी को दूर रहने की हिदायत दें।

4. योग- रस कर्पूर 10 ग्राम, लौंग 10 ग्राम, खुरासानी अजवाइन 3 ग्राम, देसी किरमानी 3 ग्राम, मक्खन आवश्यकतानुसार।
विधि- उपर्युक्त सभी औषधियों को एकत्र करके कूट-पीसकर अति महीन कर लें। जब सभी कूट-पिस जायें, तब उसमें आवश्यकतानुसार मक्खन मिलाकर 1-1 ग्राम वजन की गोलियों का निर्माण कर लें। इसकी प्रभावशक्ति अति प्रबल होती है। यह शीघ्र लाभ देता है और पीड़ित रोगी को निरोग कर देता है।
सेवन विधि- उपदंश पीड़ित रोगी को 1-1 गोली दिन में 1-2 बार अथवा आवश्यकतानुसार सेवन करने की सलाह दें। गोली ताजा जल से प्रयोग करायें। यह अनुभूत योग है जो सिफलिस, उपदंश, फिरंग, आतशक आदि में निश्चित ही लाभ करता है। कम नमक का भोजन सेवन करने की सलाह दें। गोली प्रयोग करते समय मूँग की दाल तथा खिचड़ी खाने का निर्देश दें। खटाई, अचार, लाल मिर्च, बादी पदार्थ एवं मिठाई से सख्त परहेज करायें।

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5. योग- चोबचीनी 60 ग्राम, सनाय 18 ग्राम, पित्तपापड़ा 18 ग्राम, हरड़ 18 ग्राम, काबुली हरड़ के छिलके 30 ग्राम, बहेड़ा 18 ग्राम, अमरबेल 18 ग्राम, उशवा मगरबी 72 ग्राम, स्याह हरड़ 18 ग्राम, आमला 18 ग्राम, गुलाब के फूल 12 ग्राम, शहद सभी का तीन गुना।
विधि- उपर्युक्त सभी औषधियां अलग-अलग कूट-पीसकर छान लें। उसके पश्चात् सभी को मिलाकर एक जान महीन चूर्ण कर लें। कपड़छान करने से काष्ठ भाग अलग हो जाता है। उसके पश्चात् उपर्युक्त सभी औषधियों का तीन गुना शहद मिलाकर अवलेह बना लें। यह अवलेह उपदंश का नाश कर देता है। इसका प्रभाव अति शीघ्र होता है। यह रक्त को साफ करने का कार्य करता है।
सेवन विधि- इस अवलेह की मात्रा 25 ग्राम की होती है, जो प्रतिदिन 1-2 बार सेवन करने के लिए दी जाती है।

6. योग- पारा शुद्ध 6 ग्राम, खुरासानी 6 ग्राम, आम की गुठली का मगज़ 2 नग, किरमानी 6 ग्राम, भिलावा छिला 4 दाना, नारियल मग्ज़ 20 ग्राम, पुराना गुड़ 80 ग्राम, काला तिल 10 ग्राम, देसी अजवायन 6 ग्राम।
विधि- उपर्युक्त सभी औषधियों को एकत्र करें और सभी को कूट-पीसकर एक जान चूर्ण बनाकर बेर के आकार की गोलियों को निर्माण कर किसी कांच की शीशी में भरकर सुरक्षित रख लें। ये गोलियां अति गुणकारी उपदंश को समूल नष्ट कर रोगी को पूर्ण निरोग कर देती हैं। इसके सेवन से रक्त साफ होता है। यह हानिरहित उपयोगी योग है।
सेवन विधि- इसकी मात्रा 10 ग्राम तक की होती है, जो दिन में 1-2 बार अथवा आवश्यकतानुसार सेवन करने के लिए दी जाती है। इन गोलियों की विशेषता यह है कि यह गोली अचार अथवा दही के साथ प्रयोग करने के लिए दी जाती है।

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