Napunsakta Kya Hai

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Napunsakta Kya Hai

नपुंसकता या नामर्दी परिचय

Impotence, Napunsakta, Impotence Causes

परिचय-

‘नपुंसकता’ का अर्थ पुंसत्व का अभाव और उसी प्रकार ‘नामर्दी’ का अर्थ मर्दानगी का अभाव या कमी होता है। दोनों शब्दों का अभिप्रायः एक ही है। इनसे जिस व्यक्ति में स्वस्थ, सबल, सक्रिय एवं गतिशील(तेजी से दौड़ने वाले) शुक्रकीटों की पर्याप्त संख्या में कमी और वीर्य का गाढ़ापन नहीं होना। यह विकृतियां ही नपुंसकता कहलाती है।
यथार्थ में पुंसत्व शक्ति या पौरूषता, कामजोश और तीव्र उत्साह व्यक्ति के अंदर स्थित वीर्य के गाढ़ेपन, स्वस्थ, सबल शुक्रकीटों की संख्या एवं उनकी सक्रियता पर ही निर्भर करता है। इसी वीर्य की अधिक या कम विकृति के आधार पर जब कोई पुरूष-स्त्री के साथ संभोग करने में पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से असमर्थ रहता है तो इसे नपुंसकता(नामर्दी) कहते हैं। पुरूष ही नपुंसक कहलाता है, स्त्री या नवयुवती महिला नहीं।
नपुंसकता में पुरूष के गुप्त अंग शिश्न का प्रकर्षण या उत्थान या तो एकदम होता ही नहीं अथवा यदि थोड़ा बहुत होता भी है तो संभोग क्रिया में पर्याप्त कठोरता नहीं होने के कारण अन्तः प्रविष्ट में एकदम काम नहीं आता। नपुंसकता को संस्कृत में क्लीवता, पौरूषत्वहीनता, ध्वजभंग, शिथिलता, शीघ्रपतन, शिश्न की उत्थानहीनता, मैथुन असमर्थता, संभोग असक्यताः, हिंदी में नपुंसकता, उर्दू में नामर्दगी, अरबी में नामर्दी तथा अंग्रेजी में इम्पोटेन्सी(प्उचवजमदबल) कहते हैं।

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नपुंसकता को नष्ट करने की आयुर्वेदिक औषधियाँ-

Napunsakta Kya Hai

1. योग- गोखरू तथा काले तिल 12 ग्राम, मिश्री आवश्यकतानुसार।
विधि- उपर्युक्त दोनों औषधियाँ एकत्र करें और कूट-पीसकर एक जान महीन चूर्ण बना लें। उसके पश्चात् एक किलो दूध में डालकर दूध को खूब उबाल लें। जब दूध आधा रह जाये, तब उतार लें और मिश्री मिलाकर पीड़ित रोगी को सेवन करने का निर्देश दें। यह योग अति उपयोगी, असरकारक सिद्ध होता है।
लाभ- इसका सेवन कराने से नपुंसकता-नामर्दी, शीघ्रपतन का नाश होता है। रोगी पूर्ण सक्षम, बलवीर्यवान एवं कांतिवान हो जाता है। इस योग को 40 दिन तक सेवन करने के लिए दिया जाता है।

2. योग- जावित्री 5 ग्राम, प्याज का रस 1 लीटर, लौंग 5 ग्राम, शहद 1 किलोग्राम, केसर 5 ग्राम।
विधि- उपर्युक्त तीनों काष्ठ औषधियाँ घोंट-पीसकर एक जान चूर्ण बना लें। जब बारीक हो जाये, तब एक ओर रख दें। उसके पश्चात् शहद और प्याज के रस को आपस में मिलाकर आग पर रखें। जब प्याज का रस पूर्णतः जल जाये, तब उतार लें और उपर्युक्त तीनों औषधियों का महीन किया हुआ चूर्ण उसमें मिलाकर खरल करके एक कर दें। इस औषधि को किसी शीशी में भरकर सुरक्षित रख दें। 3 ग्राम की मात्रा सुबह-शाम सेवन करायी जाती है।
लाभ- यह योग नपुंसकता, नामर्दी, शीघ्रपतन को समूल नष्ट कर रोगी को बलवीर्य कांति प्रदान करता है। अक्षम रोगी शीघ्र सक्षम हो जाता है।

3. योग- सेमल की छाल, अकरकरा, कौंच के बीज, तालमखाना के बीज, छोटी इलायची, जायफल, चाँदी की भस्म, तुलसी के बीज, बंग भस्म तथा केसर प्रत्येक 20 ग्राम।
विधि- उपर्युक्त समस्त औषधियाँ को एकत्र करें और कूट-पीसकर महीन चूर्ण बना लें। चूर्ण बन जाने के पश्चात् चूर्ण को कपड़छान कर लें। इस चूर्ण को बरगद के दूध के साथ कम से कम 12 घण्टे तक खरल करें। जब अच्छी तरह घुट जाये, तब 1-1 ग्राम की गोलियाँ निर्मित कर लें। इन गोलियों को किसी शीशी में भरकर सुरक्षित रख लें। गोलियों को छाया में सुखायें। 1-1 गोली दिन में 2 बार सुबह-शाम सेवन करने का निर्देश देने से आशातीत लाभ हो जाता है।
लाभ- यह अतीव पौष्टिक-स्तम्भक योग है। रोगी को आशातीत आनंद और मैथुन तृप्ति अनुभव होने लगती है। अति तीव्र अवस्था की नपुंसकता होने पर पीड़ित रोगी को 2-2 गोली दिन में 2 बार प्रयोग करने के लिए दें। गोली खाने के पश्चात् गाय का दूध पीने की सलाह भी दें।

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4. योग- बबूल की फलियों का चूर्ण, मोचरस चूर्ण, मौलसिरी की छाल का चूर्ण तथा शतावरी चूर्ण प्रत्येक 50 ग्राम तथा मिश्री 100 ग्राम।
विधि- बबूल की कच्ची फलियों को छाया में सुखाकर बारीक चूर्ण करें और कपड़छान करके अन्य औषधियों के कपड़छान चूर्ण में मिलाकर एक जान कर लें। जब सभी आपस में अच्छी तरह मिल जाये, तब महीन पिसी हुई मिश्री मिलाकर एक जान करें। यह चूर्ण 5 ग्राम दिन में 2 बार(सुबह-शाम) सेवन करने के लिए दिया जाता है। यह अति उपयोगी योग है। इसकी प्रभावशक्ति प्रबल होती है।
लाभ- नपुंसकता को यह योग जड़ से निकाल कर रोगी को सक्षम-समर्थ बना देता है। नपुंसकता दूर करने के साथ-साथ यह चूर्ण शीघ्रपतन और वीर्य के विकार भी नष्ट कर देता है। इसके सेवन से पतला वीर्य गाढ़ा तथा शक्तिशाली हो जाता है। इससे वीर्य की वृद्धि भी होती है।

5. योग- पिप्पली 250 मि.ग्रा., हड़ताल भस्म 125 मि.ग्रा., गुड़ 6 ग्राम, इलायची के बीज चूर्ण 500 मि.ग्रा., गिलोय सत्व 1 ग्राम, मधु 12 ग्राम, अभ्रक भस्म 125 मि.ग्रा.।
विधि- उपर्युक्त सभी औषधियाँ एकत्र कर लें। खरल करके समसर्वत्र करना चाहिए। जब एक हो जाये, तब 12 ग्राम मधु के साथ मिलाकर सेवन करने का निर्देश दें। यह एक मात्रा है। यह योग नपुंसकता को जड़ से नष्ट करने की सामथ्र्य रखता है। इसके प्रभाव से कमज़ोर रोगी बलवान, वीर्यवान तथा कांतिवान बन जाता है। इस योग का असर तीव्र गति से होता है। इस योग को दिन में 1-2 बार सेवन करायें।

लाभ-  इस योग को 3-4 माह तक लगातार प्रयोग कराने से आशातीत लाभ अर्जित होता है। इसका प्रभाव निष्फल नहीं जाता। निश्चय ही लाभ प्राप्त हो जाता है। प्रयोग के बाद दूध पीने की सलाह दें।

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