Kaam Shakti Ka Haas Aur Ayurvedic Upchar कामशक्ति का हास और आयुर्वेदिक उपचार

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Kaam Shakti Ka Haas Aur Ayurvedic Upchar

Kaam Shakti Ka Haas Aur Ayurvedic Upchar

कामशक्ति का हास-

कामशक्ति का हास अर्थात् सेक्स में अरूचि होना। जिन पुरूषों की सेक्स के प्रति इच्छा समाप्त हो जाती है या फिर शारीरिक परेशानी या अन्य नीजि परिस्थितियों के कारण सेक्स में अरूचि होने की दशा को ही कामशक्ति का हास होना कहते हैं।

कामशक्ति हास के कारण-

मनुष्य का बुढ़ापा कामशक्ति का सबसे बड़ा शत्रु है। यद्यपि बुढ़ापा भी कामशक्ति के की अति प्रयोग के कारण आता है। किसी ज्ञानी आचार्य ने लिखा है कि ”व्यवायो वार्धक्यानाम्” अर्थात् मनुष्य शरीर में बुढ़ापा को शीघ्र ही आमंत्रित करने वाले सभी साधनों में मैथुन सबसे बड़ा और प्रमुख साधन है, इसलिए कामशक्ति का उपयोग संयमपूर्ण एवं आवश्यक मात्रा में करने से बुढ़ापे के भी आने में देर लगती है और बुढ़ापे के आने पर भी मैथुन शक्ति बनी रहती है। कामशक्ति के विनाशक भावों में बुढ़ापे के अतिरिक्त चिंता, भय, शोक(दुख), क्रोध, अनिच्छा से किये जाने वाले भाव, निराशा, ठुकराया जाना, नपुंसकों की संगति, ईष्र्या, समस्यायें, घरेलू झगड़े, ग्लानि, विरक्ति की बातें एवं कार्य, अपमान, पराजय, निर्धनता, नापसंद स्त्री, अप्राकृतिक मैथुन जैसे हस्तमैथुन, पशु योनि मैथुन, पौष्टिक भोजन का न मिलना, उपवास, अति व्यायाम या बिल्कुल ही न करना, कामोत्तेजक पदार्थों का अति सेवन अथवा बिल्कुल ही प्रयोग न करना, उपदंश रोग, फिरंग रोग तथा अन्य रोग जो शारीरिक दुर्बलता को अधिक उत्पन्न कर सकते हैं।

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धातुओं का क्षय, धातुओं की अति वृद्धि, ब्रह्मचर्य का अतिपालन, असमय में मैथुन करना जैसे प्रातः, सायं मध्याह्न की तीव्र धूप में, तीव्र वर्षा में, बलपूर्वक मैथुन करना, शीघ्रता से मैथुन करना, रजस्वला से मैथुन करना, मैथुन करके शीतल जल से लिंग धोना। मल-मूत्र के वेग के होते हुए संभोग करना, रात को जागना, दिन में सोना, मादक पदार्थों का अति सेवन करना, चाय, सिगरेट, चाट मसाले आदि का अधिक प्रयोग करना, सदैव अधिक समय तक बैठे रहना या सोते रहना, गुदा, लिंग और अण्डकोष पर प्रभाव डालने वाली कोई भी क्रिया, चोट या सवारी, नंगे पैरों से तीव्र उष्ण या तीव्र शीतल या चुभने वाले पदार्थों का प्रयोग करना, मैथुन करने का ज्ञान और विधि मालूम न होना, किसी विधि और मैथुन करने के ज्ञान के अभाव में स्त्री और पुरूष अधिक शक्ति का व्यय अथवा आवश्यक शक्ति का प्रयोग न कर सकना अथवा एक-दूसरे से संतुष्ट एवं प्रसन्न न हो पाना, अति कठोर योनि अथवा अति पिलपिली योनी में विषय-भोग करना। ये वे कारण हैं, जिनसे मनुष्य की शक्ति का अभाव या क्षीणता होती है। कुछ लोग जन्मजात ही कामशक्तिहीन अथवा नपुंसक हो जाते हैं।

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कामशक्ति अभाव के लक्षण-

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1. संभोग की इच्छा न होना।

2. संभोग में आनंद न आना।

3. लिंग में पूरी कठोरता न आना।

4. संभोग के बाद थकावट प्रतीत होना।

5. एक बार संभोग के बाद निढाल हो जाना।

6. शीघ्र वीर्यपात हो जाना।

7. संभोग के दौरान ही लिंग में ढीलापन आ जाना।

8. एक दिन संभोग करने के बाद कई दिन तक इच्छा न होना, लिंग शिथिल रहना।

9. योनि में लिंग प्रवेश के कुछ क्षण बाद ही वीर्यपात होकर लिंग ढीला हो जाना।

10. वीर्य अल्प मात्रा में निकलना।

कामशक्ति के हास की आयुर्वेदिक चिकित्सा-

1. पौरूषदाता- कुचला, स्वर्ण भस्म, स्वर्ण माक्षिक, मुक्तापिष्टी प्रत्येक 12 मि.ग्रा., हिंग्गुल भस्म 1 ग्राम, अभ्रक भस्म 250 मि.ग्रा., असगंध चूर्ण 10 ग्राम, जावित्री, जायफल, कौंच के बीज, भांग और त्रिवंग भस्म प्रत्येक 5 ग्राम।
इन सबको बिदारीकन्द बाराहीकन्द, शतावर, शंखपुष्पी या सफेद मूसली के स्वरस अथवा क्वाथ में समान मात्रा में दो भावनायें देकर 125 मि.ग्रा. की टिकिया बना लें।

2. कामशक्ति केसरी- स्वर्ण, हीरा, माणक, पन्ना तथा बैक्रांत पिष्टी सब 25$25 मि.ग्रा. नाग भस्म, कज्जली, रजत, अभ्रक भस्म(1000 पुटी) प्रत्येक 1 ग्राम। तालमखाना, सालब मिश्री, लौंग, केसर, सौंठ, जायफल, जावित्री, भांग के बीज, कौंच के बीज, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, अक्ररकरा, सफेद जीरा, अजवायन खुरासानी, पीपल, मस्तगी रूमी, मालकंगनी, शुद्ध वत्सनाभ, धतूरे के बीज, सफेद मूसली, शुद्ध शीलाजीत, बहमन लाल प्रत्येक 3 ग्राम।
कस्तूरी 1 ग्राम को शंखपुष्पी के स्वरस 250 मि.ग्रा. में घोलकर या शतावर का क्वाथ 250 मि.ली. में घोलकर सबको खरल में डालकर मर्दन करें। फिर 125 मि.ग्रा. की टिकिया बना लें या कैप्सूल भर लें।
सुबह-शाम 1-1 टिकिया, दूध में शहद मिलाकर उससे प्रयोग करें। यह अनुभूत प्रयोग है। असाध्य नपुसंकों को कामशक्ति केसरी 1 टिकिया तथा पौरूषदाता 1 टिकिया मिलाकर प्रयोग करने से निश्चित ही लाभ होता है।

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3. नपुंसकत्वादि- त्रिबंग भस्म, मुक्ताशुक्ति भस्म, कज्जली, भ्रमक, ताम्र भस्म, रजत भस्म, शुद्ध कुचला, शुद्ध वत्सनाभ, भांग के बीज, शुद्ध शिलाजीत, तोदरी, असगंध, शतावर, दोनों जीरे, केसर, जायफल, जावित्री, बिदारीकन्द, इलायची, सफेद मिर्च, अकरकरा, दालचीनी, पीपल, दोनों मूसलियां, अजमोद, अजवायन, खुरासानी, लौंग, सौंठ, बंशलोचन, जुन्दबदस्तर, गोखरू, सालबपंजा, मालाकांगनी, काले तिल, मुलेहठी।
इन सबको समान मात्रा में सूक्ष्म चूर्ण करके अदरक के रस में घोट लें तथा 2-2 मि.ग्रा. की टिकियां बना लें। इसकी 1 टिकिया और बसन्त कुसुमाकर रस 1 टिकिया दोनों को पान में रखकर प्रयोग करें। इससे इन्द्रिय की कमजोरी, सुस्ती, नामर्दी, इन्द्री का ढीलापन व पतलापन, छोटापन, टेढ़ापन, नसों का फूलना, दम फूलना, शीघ्रपतन, नसों में पानी भरना आदि सभी दूर होकर कामशक्ति बहुत अधिक बढ़ जाती है तथा पूर्ण यौवन आ जाता है। असाध्य नपुंसकों को इसके साथ कामशक्ति केसरी मिलाकर प्रयोग करने से निश्चय ही लाभ प्राप्त होता है।

4. तालमखान चूर्ण 6 ग्राम, कौंच के बीज का चूर्ण 6 ग्राम। ऐसी एक मात्रा फांक कर ऊपर से मिश्रीयुक्त धारोष्ण दूध पियें। शक्तिवर्धक योग है।

5. 40 वर्ष से अधिक आयु वालों को रस तथा भस्मों का प्रयोग लाभप्रद रहता है। इस संबंध में महालक्ष्मी विलास रस, मकरध्वज या चन्द्रोदय रस, वृहद पूर्णचन्द्र रस, श्रृंगार अभ्रक रस(बृहद), बसंत कुसुमाकर रस इत्यादि में से किसी एक का प्रयोग करें।
कौंच पाक, मूसली पाक, आम पाक, असगंध पाक आदि में से भी किसी एक का सेवन करना लाभप्रद है।

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